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OM DIKSHIT


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शतरंजी चाल….. चीन की या मोदी की ?

Posted On: 19 Sep, 2014  
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अमरनाथ जी यात्रा… कठिन लेकिन सुखद

Posted On: 4 Aug, 2014  
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वह….अबला..थी..या…शबनम ?.”सामाजिक आलोचना” (कांटेस्ट)

Posted On: 27 Jan, 2014  
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बड़का चाचा ….I संस्मरण I ….II कांटेस्ट II

Posted On: 19 Jan, 2014  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

கார்த்தி,அவர் சிறிது காலம் இருந்தது பொலிகண்டி001000 முகாமில். இது யாழ்ப்பாணம் வடமராட்சியில் கடற்கரையோரமாக உள்ள ஓர் ஊர். இதற்கு மேல் அந்த சகோதரரைப் பற்றி எனக்கு எந்த விவரமும் தெரியவில்லை. உங்கள் முயற்சி வெற்றிபெற என் மனம் நிறைந்த à Ãõாî´à¯ ®¤à¯® Â®Â¤Ã Â¯ÂÃ Â®Â•Ã Â¯ÂÃ Â®Â•Ã Â®Â³Ã Â¯Â.ÂÂ

के द्वारा:

आदरणीय ओम दीक्षित जी, सादर अभिवादन! बहुत दिनों के बाद आपकी लेखनी से सशक्त और निष्पक्ष आलेख का सृजन हुआ है. आपने सबको लपेटा है. नीतीश के चेहरे की चमक गायब है.- पिछले दिनों बिहार भ्रमण के दौरान मुझे भी यही अहसास हुआ है. बाकी सबकुछ आपने लिख दिया है. भाजपा भी सत्ता की लालच में कश्मीर में जो कुछ कर चुकी है या करने को लालायित है, किसी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता. ओ पी शर्मा और कुछ वकीलों द्वारा ओन स्पॉट न्याय वह भी कोर्ट में उचित नहीं कहा जा सकता जिसकी निंदा सुप्रीम कोर्ट ने भी किया है. कानून के तहत दोषी को सजा दी जानी चाहिए और जब कसाब और अफजल जैसों को अपना पक्ष रखने को कोर्ट जब पूरा समय देती है तब इस मामले में भी पूरी छान-बीन के बाद ही न्यायलय द्वारा ही सजा का ऐलान होना चाहिए. एक बार पुन: आपका अभिनंदन! सादर! .....यह प्रतिक्रिया आपके नूतन ब्लॉग 'सत्ता के लिए----कुछ bhi के लिए है. पर वहां कमेंट के लिए क्लोज्ड मैसेज आ रहा है इसलिए इसे यहाँ ही पेस्ट कर रहा हूँ ताकि आप तक मेरा विचार पहुँच सके.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: OM DIKSHIT OM DIKSHIT

के द्वारा: OM DIKSHIT OM DIKSHIT

के द्वारा:

‘ड्रैगन’ हमेशा टेढ़ी चाल चलता है.’हाथी’ की तरह चलने से काम नहीं चलने वाला है.शतरंज बिछ गया है तो यह ध्यान रखना होगा कि….हमारे प्यादे भी सुरक्षित रहें, वार्ना चीनी ऊंट और घोड़े कभी भी ….शह और मात …का खेल खेलने में पीछे नहीं रहेंगे.हमें यह याद रखना होगा कि ……”.हम एक ऐसे सशक्त और सक्षम किरायेदार (ड्रैगन)को अपने घर में रख रहें हैं,उसे निर्बाध रूप से आने-जाने और रहने का एग्रीमेंट कर रहे हैं, जो आर्थिक,सामरिक और धोखा देने में हमसे बीस गुना है,और यदि कोई किरायेदार ….दस और बीस गुना किराया दे रहा है तो सावधानी अपेक्षित है और हर समय चैकन्ना रहते हुए उसकी हर गति-विधि पर कड़ी नज़र रखनी ही पड़ेगी.वार्ना मात निश्चित है.”................बिल्कुल सही समझा है आपने । चीन पर भरोसा कतई नही किया जा सकता । इसकी चालें ज्ल्द समझ में नही आतीं और जब आतीं हैं तब तक देर हो चुकी होती है ।

के द्वारा: एल.एस. बिष्ट् एल.एस. बिष्ट्

ड्रैगन’ हमेशा टेढ़ी चाल चलता है.’हाथी’ की तरह चलने से काम नहीं चलने वाला है.शतरंज बिछ गया है तो यह ध्यान रखना होगा कि….हमारे प्यादे भी सुरक्षित रहें, वार्ना चीनी ऊंट और घोड़े कभी भी ….शह और मात …का खेल खेलने में पीछे नहीं रहेंगे.हमें यह याद रखना होगा कि ……”.हम एक ऐसे सशक्त और सक्षम किरायेदार (ड्रैगन)को अपने घर में रख रहें हैं,उसे निर्बाध रूप से आने-जाने और रहने का एग्रीमेंट कर रहे हैं, जो आर्थिक,सामरिक और धोखा देने में हमसे बीस गुना है,और यदि कोई किरायेदार ….दस और बीस गुना किराया दे रहा है तो सावधानी अपेक्षित है और हर समय चैकन्ना रहते हुए उसकी हर गति-विधि पर कड़ी नज़र रखनी ही पड़ेगी.वार्ना मात निश्चित है.” आदरणीय ओम दीक्षित जी, सादर अभिवादन! क्या सटीक विश्लेषण किया है आपने! वैसे अपने प्रधान मंत्री भी कच्चे खिलाड़ी तो हैं नहीं ...कूटनीति से ही जंग जीती जा सकती है..और इसका भरपूर इस्तेमाल मोदी जी कर रहे हैं, ऐसा मेरा मानना है....अब तो मुस्लमान भी देश भक्त हैं यह भी उन्होंने कह दिया ....

के द्वारा: jlsingh jlsingh

बर्फ से बने उस भव्य शिवलिंग के दिव्य-दर्शन होते ही अजीब सा भावुक हो गया.आँखों में आंसू छलक आये,पचीस वर्ष पुरानी अभिलाषा जो पूरी हो गयी थी.सहसा विश्वास नहीं हुआ….कि आज बाबा के दरबार में हूँ.पास में ही ….दूसरा शिवलिंग ,जो माँ पार्वती का प्रतीक और दोनों के बीच छोटी-छोटी दो आकृतियां जिसे ….श्री गणेश और श्री कार्तिकेय बताया गया.ऊपर ….उन दोनों कबूतर के भी दर्शन हुए.हम सभी लोग अपने को धन्य समझ रहे थे.सारे कष्ट भूल गए…और एक सुखद एहसास !!!!!बार-बार कानों में एक ही स्वर …गूंज रहा था……’जय बाबा बर्फानी’!!…….’जय बाबा अमरनाथ’!!!.बहुत बहुत बधाई आपको , आपने बाबा अमरनाथ के दर्शन कर पाने का सौभाग्य प्राप्त किया ! हर हर भोले , जय बाबा अमरनाथ

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय ओम दीक्षित जी ! ’जय बाबा बर्फानी’!!…….’जय बाबा अमरनाथ’!!!.आपको और आपके परिवार को बाबा अमरनाथ जी की सकुशल यात्रा करने की बधाई और इतनी सजीव यात्रा विवरण देने के लिए धन्यवाद ! आपने सही कहा है कि-"मन में तरह-तरह के विचार……क्या लाखों लोग दर्शन करने जाते हैं,तो सभी लोग वहीँ रह जाते हैं?क्या सभी लोगों को आतकवादी निशाना बना लेते हैं?क्या सभी लोग ऑक्सीजन की कमी से मर जाते हैं?क्या रास्ता कठिन है तो ,तो सभी लोग खाई में गिर जाते हैं?क्या इतनी ठंढ पड़ेगी कि सभी ठंढे हो जाएंगे?फिर जिसका पूरा हो जायगा वह कहीं भी और कभी भी जा सकता है." इस बात में कोई संदेह नहीं कि-’जब उनका बुलावा आता है ,तभी दर्शन मिलता है’.

के द्वारा:

के द्वारा: DR. SHIKHA KAUSHIK DR. SHIKHA KAUSHIK

के द्वारा: nishamittal nishamittal

आदरणीय ॐ दीक्षित जी, सादर अभिवादन! बहुत ही अच्छा संतुलित आलेख! इससे तरह का मिलता जुलता आलेख मेरा भी है, मैं इसे प्रकाशित करने जा रहा हूँ! आपके असमंजस शायद मफलर पर है तो आपने देखा होगा केजरीवाल VIP गैलेरी में भी मफलर लगाकर बैठे होंगे ..सहमे हुए से. अब VIP गैलेरी वाली बात टी जो मुझे समझ में आती है ..उनके दस अंगरक्षक जिसका फोटो रवि प्रताप रूढ़ी और सहनवाज हुसैन ने किया है वे दस अंगरक्षक उन्हें VIP गैलेरी में लाने के लिए होंगे ... ऐसा मेरा मानना है ...दल दल में तो फंसते जा रहे हैं ...किसी भी परंपरा से लड़ना आसान तो नहीं होता... अभी भी प्रेम करने की सजा ...महापंचायतों में सुना है न! मेरे ख्याल से जरूरत है उनको राजनीतिक सलाकार की या अपने अंदर कूटनीति पैदा करने की राजनीति केवल सच बोलकर नहीं की जा सकती.....सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

भी ऐसे कई अवसर आये हैं,..जब ..घुड़-चढ़ी के पहले ..ही घोड़ी बिदक गयी हो या…सुहागरात का सपना सजोये हुए ….दूल्हा और दुल्हन ..के .विवाह के पहले कोई बाधा उत्पन्न होने के कारण…..सपने टूट गए हों ..और बिन-व्याहे ही बारात वापस हो गयी हो.लेकिन इस समय.. दुःख की घडी है.कांग्रेसियों के सपने ..चूर-चूर हो गए.मिजोरम ने अपने रूमाल …से आंसू पोंछने का प्रयास किया.लेकिन …आंसुओं के प्रवाह को रोक नहीं पाये.विवाह समारोह……रोदन समारोह में बदल चुका था. शीला जी को तो जैसे काठी मार गयी हो.उन्होंने अपने आंसुओं को छुपाने का पूरा प्रयास किया.शायद! … रोदन समारोह में आने के पहले .किसी कमरे में जाकर आंसुओं को निकाल आयी थी. दुनिया कैसे एक ही विषय के पीछे लिखे जा रही है , आपने भी वाही विषय पकड़ लिया ! लेकिन कुछ अलग और ये कुछ अलग ही आपको कुछ अलग कर देता है भीड़ से ! और ये कुछ अलग ही मुझे खींच लाता है आपके ब्लॉग तक ! मस्त मस्त लिखा है ! श्री दीक्षित जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: jlsingh jlsingh

केदार-धाम में जो कहर बरपाया है,उसे सुनकर ही रोंगटे खड़े हो गए.उस रात में, एक जोरदार धमाका सुनाई पड़ा,और कुछ सोचने और धर्मशालाओं से बाहर निकलने के पहले ही पानी और मलबों का एक सैलाब आकर मंदिर के चबूतरे से टकराया और दो भागों में बंटकर मंदिर के चारो तरफ पड़ने वाले सभी,भवनों ,दुकानों और इंसानों को बहा ले गया. .बिजली ,पानी का अकाल पड़ गया.संचार -व्यवस्था ठप हो गयी .बचाए गए लोगों ने ,चैनलों पर जो जानकारी दी है,उसे सुनकर,ही मन पीड़ा से भर गया.केवल बारह घंटे के भीतर दोबारा आये सैलाब ने बची -खुची चीजों को अपने नीचे दबा लिया .जो लोग रात में भैरो पहाड़ी पर भाग कर छुपे थे वह बच गए.बचाने गए सेना तथा पुलिस के कुछ जवानभी लापता हैं.भारत सेवा आश्रम में तीन सौ लोग ठहरे थे ,उनकी खोज जारी है. केवल केदार नाथ में ही नहीं पूरे उत्तरा खंड और चारो-धाम में कोहराम मच गया.मुझे केदार-धाम सहित चारो-धाम जाने का सौभाग्य प्राप्त हो चुका है.जो मैंने आठ साल पहले देखा था, केवल उसी को ध्यान रखा जाय तो केवल केदार-धाम में मरने वालो की संख्या बताये जा रही संख्या से कई गुना होगी,अन्य धामों की तो बात ही छोड़िये .हमारे पंडित जी का भी मकान नहीं बचा होगा,जो बगल में ही था.बचा है तो केवल…..केदार नाथ मंदिर…और कुछ दूरस्थ भवन.इसे केदार नाथ जी की महिमा कही जाय या और कुछ? ऐसी त्रासदी और वीभत्स हादसा है की लोगों के जेहन में हमेशा एक नासूर की तरह बना रहेगा ! जो बाख गए वो भाग्यशाली थे और जो इहलोक चले गए उन्हें श्रधांजलि !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय ओम जी , सादर नमस्कार आपने मेरे लेख '' औपचारिक होती ....'' पर प्रतिक्रिया दी । ओम जी मैं आपको एक बात बता देती हूँ कि हर चीज का जिम्मेदार हमारा मीडिया नहीं है । मीडिया तो सभी तरह के कार्यक्रम दिखाता है अगर वह फालतू के प्रोग्राम दिखाता है तो आप ये क्यों भूलते हैं कि वह सत्संग या धार्मिक कार्यक्रम भी तो दिखाता है। ये तो जनता के ऊपर निर्भर करता है कि वह क्या देखना पसंद करती है । ओम जी आप अख़बार उठाकर देखिए जितनी भी दुष्कर्म की घटना हो रही है वे सब शराबियों द्वारा हो रही हैं । नशे में ये मानसिक सन्तुलन खो बैठते हैं । जब तक नशे पर सख्ती से पाबंदी नहीं लगेगी तब तक दुष्कर्म की घटनाएँ नहीं रुकेंगी । मुझे पूरा यकीन है जो टिप्स मैंने दिए हैं अगर उन पर अमल किया जायेगा तो हमारे समाज में इस तरह की घटनाओं में जरुर कमी आएगी ।

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भैय्या दीक्षित जी आपकी व्यथा बहुत ही मार्मिक है - आपने स्वयं ही व्यक्त किया है नेताओं की भूख बड़ी अजीब है उनको पेट की क्षुधा नहीं होती है उनको मन की अशांति की भूख होती है जिसमे सबसे अलग दिखने की भूख विदेशी बैंकों में धन जमा करने की भूख और न जाने कितने किस्म की भूख जिनका वर्णन करना भी सही नहीं है. ? लेकिन हमारे देश में जो भूखमरी है उसका सबसे बड़ा कारन धन संपदा का असमान वितरण जहाँ एक कारखाने का मालिक केवल धन लगा कर मजदूरों के द्वारा सामान तैयार करवा कर इतना प्रॉफिट कमाता है जिसका अनुमान साधारण व्यक्ति नहीं लगा सकता - और दूसरा सबसे महत्त्व पूर्ण कारन मेरी समझ में शिक्षा का अभाव क्योंकि सरकारी गलत नीतियों के कारण जो स्कूल कालेज विद्यालय - शिक्षा के मंदिर कहलाते थे आज कमाई करने का मुख्या साधन बन गए है इस लिए - :

के द्वारा:

क्या हो गया है हमारी बहुओं को?जहाँ कोई कष्ट नहीं है वहां भी आखिर ऐसी सोच या ऐसा व्यवहार क्यों ?आखिर मायके का…हस्तक्षेप क्यों बढ़ता जा रहा है,इन बेटियों के ससुराल में?आखिर इसका अंत क्या होगा?मायके वालों का दोहरा चरित्र क्यों?अपनी बहू के मायके वालों का हस्तक्षेप ,बर्दास्त नहीं लेकिन अपनी बेटी के ससुराल की एक-एक पल की रिपोर्ट और उस पर त्वरित -हस्तक्षेप की बात समझ से परे नहीं है?क्या ऐसा नहीं लगता की बेटियों के लालन-पालन या संस्कार में कोई चूक अवश्य हो रही है?क्यों हर माँ-बाप यह सोचते हैं की ,हमारी बेटी उस परिवार में जाय,जहाँ कोई ननद या देवर नहीं हों?सास-ससुर न हों तो ,उसकी बेटी जाते ही सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त रहे?क्यों कोई ननद,यह चाहती है की ,उसकी भाभी ,उसके माँ-बाप की पूरी सेवा करे ,लेकिन उसके स्वयं के सास-ससुर या परिजन से वह दूर रहे?क्या यह सोच हमारी संस्कृति और हमारे संयुक्त परिवार की नींव को खोखली नहीं करती जा रही है?क्यों पति पर दबाव डालने के लिए ,किसी कानून का सहारा लिया जा रहा है?दहेज़-लोभियों के विरुद्ध निश्चित ही कार्यवाही होनी चाहिए,लेकिन क्या किसी माँ-बाप को अपनी बेटी की निजी ज़िन्दगी में ,बहुत ज़रूरी या अपरिहार्य न होने पर भी हस्तक्षेप करना चाहिए?क्यों न ससुराल या मायके वाले मिल-बैठ कर किसी समस्या का निदान ढूढें,और कोर्ट-कचहरी से दूर रहें ,और दोनों परिवारों की बदनामी से बचें?अभी कल की ही बात है,वाराणसी की ‘ममता’ सास-बहू के बीच लहसुन-प्याज़ के विवाद की ‘भेंट’चढ़ गयी.आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है. आज का समय ऐसा है की कहीं सास तो कहीं बहु अपना रंग दिखा रहे हैं ! एक बात जो आपने कही की अगर परिवार को खुश रखना है तो बहु की बहुत बड़ी जिम्मेदारी बन जाती है ! हालाँकि सिर्फ बहु को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता है ! ये जंग जारी रहेगी -मुझे ऐसा लगता है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय दीक्षित जी, सादर अभिवादन! आपकी चिंता को समझ सकता हूँ.... आपने एक ब्यापक समाज की सच्ची तस्वीर दिखलाई है ... मुझे फणीश्वर नाथ रेणु के 'मैला आंचल' का एक पात्र 'भिम्मल मामा' बहुत याद आ रहे हैं. वे कुछ भी नयी घटना के बाद एक ही डायलाग बोलते हैं - "अभी क्या हुआ है? ... अभी और होगा !" कल्पना कीजिये साहब, जब बच्चा अपने बाप की बारात में जाएगा? ... नहीं समझे ? अरे वही सोलह साल में सहमती से जब शरीरिक सम्बन्ध बनेंगे और नाजायज औलाद को उसका हक़ दिलाने के लिए सहमती से शादियाँ बहुत बाद में होगी तो क्या बेटा अपने बाप की बारात में सहबाला बन कर नहीं जायेगा ? चुपचाप देखते रहिये और अपना सर धुनते रहिये महोदय! अभी क्या हुआ है अभी और होगा ...हमारी प्राचीन संस्कृति!.... ढूढ़ते रह जाओगे किताबों में ...... साभार !

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय ओम जी, सादर ! ये नेता मानवता के नाम पर कलंक हैं ! लाशें पड़ी है, घायल चीख रहे हैं, हर तरफ अफरा-तफरी है, लोग बेहाल हो रहे हैं, स्ट्रेचर नहीं है, दवाइयां नहीं है, मदद नहीं है, एम्बुलेंस नहीं है, पर ये केवल बयान दे रहे हैं ! लगभग ५०० लोग लापता हैं, जानकारी देने वाला कोई नहीं ! करोड़ों - अरबों का फंड रखने वाली पार्टियां, चाहे वह कोई भी पार्टी हो, किसी ने इन बेबसों के लिए मदद का हाथ आगे नहीं बढ़ाया ! दो दिन होने को आये, भाजपा के नेता भी केवल बयान दे रहे हैं, घटना स्थल पर जाकर उनकी सुधि लेने का ख़याल इनको नहीं आया ! महज दस-बीस लाख के खर्च में हजारों लोगों कि परेशानियां दूर हो सकती थी, पर किसी पार्टी ने ऐसा नहीं किया ! धिक्कार है !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

के द्वारा: omdikshit omdikshit

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

आदरणीय दीक्षित साहब सादर, सही कहा है आपने आरक्षण जाति के नाम पर देने का वक्त गुजर चुका है अब यदि आरक्षण देना हि है तो आर्थिक आधार पर दो और पदोन्नति में आरक्षण तो किसी भि लिहाज से सही नहीं है. और फिर इसमें यह भी निर्धारित नहीं है कि  कितनी पदोन्नतियां जाति के आधार पर दी जायेंगी क्योंकि इसका खामियाजा हमारे विभाग में कुछ लोगों सहना पड़ रहा है जहां एक व्यक्ति लगभग तीस वर्ष कि नौकरी में एक भी पदोन्नति नहीं पा सका है वहीँ आरक्षण के नाम पर दूसरा मात्र २०-२२ वर्ष में तीन पदोन्नतियां ले चुका है. ऐसी विसंगतियाँ समाज में मतभेद बढाएगी या कहूँ बढ़ा रही है तो गलत नहीं होगा. देश कि जनता को विचार करना चाहिए कि ऐसे लोग सत्ता में कभी भी ना आने पायें वरना देश में अंतर्कलह निश्चित ही पैदा होगा. 

के द्वारा: akraktale akraktale

मुख्य -विषय यह है कि…. आखिर इसका कोई अंत है या नहीं?क्या इससे देश का भला होने वाला है?सरकारें क्या यह चाहती हैं कि …केवल जाति के आधार पर ,योग्यके ऊपर अयोग्य को प्रोन्नति देकर ,योग्यता को पंगु कर दिया जाय?फिर कुंठा से ग्रस्त होकर वही योग्यता निराशा का कारण बन जाये?क्या फिर योग्य सवर्णों /युवकों द्वारा अपने जीवन की बलि नहीं दी जाएगी?क्या सरकार यह सोचती है या यह मान लेती है कि,जाति के आधार पर चुने गए लोग …..हमेशा अयोग्य ही रहते हैं और यदि उन्हें ….आरक्षण देकर प्रोन्नत नहीं किया गया तो वे अपनी योग्यता से कोई प्रोन्नति नहीं पा सकते?क्या संविधान के निर्माताओं या डा.अम्बेडकर के दिमाग में यह बात थी,कि बिना आरक्षण की वैसाखी के ,इन जातियों के लोग आगे बढ़ ही नहीं सकते?इन्हें मुख्य-धारा में लाने का केवल यही रास्ता बचा है?क्या इस वर्ग के लोग आरक्षण के सहारे ही आगे बढ़ने में अपने को हेय- दृष्टि से नहीं देखेंगे?क्या इन्हें हर-स्तर पर यह एहसास दिलाना आवश्यक है कि वह आरक्षित-श्रेणी में हमेशा से हैं और हमेशा रहेंगे?जिस डा.अम्बेडकर की दुहाई दी जाती है,क्या वह स्वयं आरक्षण के बलबूते ही आगे बढे थे,और आज अमर हो गए?क्या इससे समाज में कटुता और नहीं बढ़ेगी?यह सब ऐसे प्रश्न हैं आपने जितना सटीक लिखा है उसके बाद कुछ कहने के लिए रह ही नहीं जाता ! आज आंबेडकर की सोच को बरकरार रखना भी समाज को टूटने की कगार पर ले जा रहा है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय ओम दीक्षित जी, एफ.डी.आई., सी.बी.आई. का राजनीतिक खौफ, मीडिया की भूमिका, वर्तमान बाज़ार की विसंगति तथा प्रचार-दुष्प्रचार पर प्रभावी आलेख; साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! "क्या इससे वास्तव में देश का भला होगा या विदेशियों का?क्या इसका लाभ किसानों और छोटे उद्यमियों को मिलेगा?कहीं हम ..ईस्ट-इंडिया कंपनी की तरह आर्थिक-गुलामी में तो नहीं जकड़े जायेंगे?कहीं कांग्रेस की यह चाल देश के लिए उल्टा तो नहीं पड़ जाएगी?सरकार के समर्थकों का कहना है कि इससे विदेशी मुद्रा आयेगी,रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे,किसानों को और जनता को फायदा होगा,बिचौलिए समाप्त होने से दाम कम होंगे,……कहीं यह मृग-मरीचिका तो नहीं है?"

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

आदरणीय रक्ताले जी, नमस्कार. यह तो एक खुला मंच है ,जिसमे सभी अपने विचार खुल कर रखते हैं,अतः क्षमा मांगने या करने की कोई बात ही नहीं होती है.आप को शायद यह ज्ञात होगा की हर सरकारें अपने प्रदेश या देश में नये उद्योगों के लिए पाँच से पंद्रह वर्षों के लिए कर -मुक्ति या कर-अवकाश के रूप में छूट देती हैं ,जिसका लाभ लेकर इकाइयाँ बंद कर दी जाती हैं और फिर नये नाम व स्थान पर नये उद्योग लगा दिए जाते हैं.कच्चे माल की खरीद पर टैक्स को बाद में समायोजन की भी सुविधा दी जाती है,निर्यात पूरी तरह से कर मुक्त होता है,इनकी खरीद भी करमुक्त होती है.और भी अनेक सुविधाएँ यहाँ के व्यापारियों को दी जाती है ,जिसका अधिकांश व्यापारी गलत तरीके से लाभ लेते हैं,और पार्टियों को चंदा दे देते हैं ,फिर दाम बढ़ता रहता है.थोडा देशी उद्योगों और व्यापारियों की तह में जाइए,तो स्वयं हकीकत जान जायेंगे.

के द्वारा: omdikshit omdikshit

आदरणीय दीक्षित साहब,                              सादर, क्षमा चाहूँगा.कोई जिद की बात भी नहीं है मगर हम सब भलीभांति जानते हैं की जब शहर में मेला लग जाए तो सबका मन होता है झुला झुलने का. आपका कथन सही है की हम विदेशों में कारोबार कर रहे हैं और विदेशी हमारे यहाँ. ठीक है यदि विदेशी देश में कारों का उत्पादन करे तो किसी को हर्ज नहीं है. किन्तु रिटेल हर आम आदमी से जुडा मसला है. उसमे विदेशी तब ही प्रवेश करें जब हम अपने यहाँ सुधार करलें. जिन सुविधाओं का प्रावधान विदेशी कंपनियों के लिए है वह देशी कंपनियों को पहले दें. बिचौलियों का मुद्दा बार बार उठता है सरकार उस पर कठोर कदम उठाये. विदेशी निवेश सिर्फ इस मायने में सही होगा की वह बहुत बढ़ा इन्फ्रास्त्रुक्चर खडा करेगा. किन्तु हमारा देश भर्ष्टाचार में जैसे नित नए रिकॉर्ड बनाता जा रहा है वह भविष्य की भयावहता को बढ़ा ही रहा है.

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: omdikshit omdikshit

आदरणीय दीक्षित जी, सादर अभिवादन, सर्वप्रथम बेस्ट ब्लॉगर बनने पर बधाई स्वीकार करें … जिसकी जितनी श्रद्धा ,उसका उतना तरीका .कुल मिला कर यह कहना है कि सब अपनी शक्ति के अनुरूप पूजा करते हैं और यह मान लेते हैं कि ….माँ ….उनके पूजा को स्वीकार कर ली और प्रसन्न हो गयी , और माँ के …’आशीर्वाद ‘ के असली हकदार वही हैं…माँ का आशीर्वाद ,उन्हें किसी न किसी रूप में मिलता भी है. पूजा चाहे जिस रूप में की जाय ,सभी के पीछे मानव -कल्याण की भावना होनी चाहिए . सहमत. महोदय, मैं आशा करता हूँ कि मेरे ब्लॉग ....... वास्तव में सच तो यही है जनाब..... पर आपका आगमन होगा और मुझे आपकी प्रतिक्रिया से कुछ नया मार्ग - दर्शन मिलेगा ! सादर आमंत्रण सहित! मधुर भारद्वाज http://madhurbhardwaj.jagranjunction.com

के द्वारा: Madhur Bhardwaj Madhur Bhardwaj

आदरणीय दीक्षित साहब                       सादर नमस्कार, बिलकुल सही लिखा है आपने माता अवश्य ही असमंजस में पड़ जाती होगी. मगर हम सभी तो उनकी सन्तान है. हर परिवार में कई स्वभाव वाले सदस्य होते हैं उनका जिस तरह निर्वहन होता है माँ भी उसी तरह सभी को पालती है. गलत कार्य पर सजा तो अवश्य ही मिलती है यह तो प्रकृति का नियम है, सजा हमारी आकांक्षा के अनुरूप हो यह आवश्यक नहीं. और इसके कई उदाहरण भी हमने देखे हैं.                        सही कहा आज अधिकाँश भक्त माता के दरबार में सिर्फ धन प्राप्ति के आशीष कि कामना लिए ही जाते हैं और इसी का परिणाम है कि हम धन के साथ ही अशांति का माहौल भी देख रहे हैं.माँ सबका कल्याण करे. आपके सुन्दर आलेख के लिए हार्दिक बधाई.

के द्वारा: akraktale akraktale

आदरणीय शशि भूषण जी, नमस्कार. जी हाँ.प्रांतीय सेवा ,उ.प्र. से जुड़ा रहा हूँ, इस लिए मैं कुछ-एक घटनाओं का साक्षी भी रहा हूँ.सरकारी सेवकों के लिए 'आचरण -नियमावली' का डंडा रहता है, जिसका भय दिखाकर उन्हें ,मौखिक आदेश भी मानने के लिए बाध्य किया जाता है.पद-लोलुप,चाटुकार या पूर्वाग्रह से ग्रसित ,अधिकारी नेताओं के 'माया-जाल' में फंसते जाते हैं.ऐसे ही अधिकारी अधीनस्थों पर भी .'डंडा' भाजते रहते हैं और .....तरह-तरह के ....बेतुके और 'असंसदीय' व्यव्हार का रास्ता अपनाते हैं.जो सख्त एवं ईमानदार हैं,उन्हें ....'मलाईदार पदों 'की चिंता नहीं रहती है,इसलिए उन्हें 'महत्त्व-हीन' पदों पर भेज कर मुख्य-धारा से अलग ही कर दिया जाता है,जहाँ उनका विवेक काम नहीं करता.आप की सकारात्मक 'सोच'के लिए धन्यबाद.

के द्वारा: omdikshit omdikshit

आदरणीय दीक्षित जी, सादर ! मुझे महसूस हो रहा है की आप भी या तो इस सेवा से जुड़े हैं, या जुड़े रहे हैं ! परन्तु यह वर्ग कोई अशिक्षितों और कमजोरों का वर्ग नहीं है, बल्कि यह वह वर्ग है, जिनके हाथ में प्रशासन की बागडोर और अप्रत्यक्ष रूप में सत्ता की बागडोर भी रहती है ! यह वर्ग कोई आम जनता का वर्ग नहीं है, जिसे ५ वर्ष में एक बार वोट डालने का मौक़ा मिलता है, तो फिर यह वर्ग इतना असहाय और बेचारा क्यों है ? क्यों अपने को इन अस्थायी नेताओं के चंगुल में फंसने देता है ? आम जनता के सम्बन्ध में कहा जाता है की वह जागरूक नहीं है, क्यों की उसमें शिक्षा का अभाव है, पर यह वर्ग तो केवल शिक्षित नहीं बल्कि उच्च शिक्षित होता है, फिर वह क्यों नहीं अपने अधिकारों के प्रति, अपने सम्मान के प्रति सजग रहता है ? क्षमाप्रार्थना सहित सादर !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

श्री ओम दीक्षित जी , सादर ! आपने बहुत सटीक उदहारण देकर हमारे नेताओं के चाल चलन को परिभाषित किया है , बधाई ! अब आते हैं आरक्षण की बात पर ! क्या फर्क पड़ता है इस आरक्षण से ? मैं तो समझता हूँ आरक्षण १०० प्रतिशत लागू कर दो ! हर जगह लागू कर दो ! प्रधानमंत्री , राष्ट्रपति , सेना में खेलों में ! कह दो सबसे , ओलम्पिक में सिर्फ वाही खिलाडी जायेंगे जिनका कोटा होगा , क्रिकेट में भी आरक्षण लाओ ! कांग्रेस के अध्यक्ष के पद को भी आरक्षित कर दो , समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष पद को भी आरक्षित कर दो ? हम में इतनी शक्ति है की हम अपना पेट कैसे पाल सकते हैं , जानते हैं ! एक बात बताता हूँ- शायद अलग हो ! मैंने पढ़ा था कहीं ! १९९० के दशक में ऑस्ट्रेलिया से २०-२२ परिवार आये थे भारत , उनके बच्चा नहीं हुआ था ! उन्हें सीमेन चाहिए था ! उनका स्पष्ट कहना था की उन्हें ब्रह्मण का ही सीमेन चाहिए ! जब हमारी मेधा , हमारी ताकत है तो डर कैसा ?

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

सादर प्रणाम! आप सोच रहे होंगे कि मेरी इन बातों का कोई आधार नहीं है.आपात- काल के समय या उसके बाद देश को अस्थिर करने में इन्ही भाइयों का हाथ था.आतंकवाद को उकसाने,… क्षेत्र-वाद को बढ़ावा देने और जातिवाद,सम्प्रदाय-वाद …की आग को हवा देते रहने की योजना राजधानी में या दिल्ली में ,इन्ही भाइयों द्वारा बनती थी.मंदिर-मस्जिद का विवाद इन्ही की देन है. यह बात और है कि मौसेरे भाइयों के इस खेल में अनेकों बार ,परिस्थितियां इनके हाथ से भी निकल जाती हैं ,और इसके वीभत्स-परिणाम जनता को ही झेलने पड़ते हैं.आसाम हो या पंजाब,तेलंगाना हो या गोरखालैंड,सभी के पीछे यही कारण है.नक्सल-वाद भी इन्ही भाइयों की देन है.फिर भी यह खेल चलता आया है और चलता ही रहेगा क्योंकि…….नेता-नेता….भाई-भाई ………I सच के करीब से गुजरता हुआ..........आलेख नए शिरे से सोचने पर मजबूर करता हैं.........हार्दिक आभार!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: omdikshit omdikshit

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के द्वारा: omdikshit omdikshit

के द्वारा: omdikshit omdikshit

आदरणीय ओम सर , नमस्कार .. बाबाओ की पोल दिनोदिन सबके सामने आ रही है चाहे .. भारत की जनता गरीब रह कर भी आपने आस्था और मुसीबत से निजात पाने के चमत्कार के चक्कर में कब इनके चक्कर में आ कर इन्हें अरब पति बना देती हैं इन्हें खुद संज्ञान नहीं हैं .. और इसका फायदा उठा रहे हैं ये तथाकथित आधुनिक भगवान् .... चंडोक जी ने ऐसे ही भारतीयों को मुर्ख नहीं कहा है / गरीबी में रहने वाले इनका भगवान् सोने और हीरे जडित सिंघासन पे बैठ .. रामायण और भगवत की कहानियां सुनाता है और ये हाथ बंधे सुनते रहते हैं और इनकी तिजोरी भरते रहते हैं .. धिक्कार है ... जहाँ तक स्वामी रामदेव जी की बात है तो वो इन पाखंडियों से अलग हैं .. रामायण बाच कर .. मुर्ख नहीं बना रहे हैं किसी को .. कोई चमत्कार या तीसरी आँख खुलने का पाखंड नहीं कर रहे है इन्होने योग को किताबो से और महलो से निकाल कर झोपड़ो तक पहुचाया हैं ...... आज घर -२ में योग लोग कर रहे हैं .. इसका सम्माज तो हमेशा कृतज्ञ रहेगा / आयुर्वेद को फिर से जीवन दान दिया है .... अगर पैसे बने हैं .. तो मेहनत भी हुआ है .......... अगर लोगो ने ईनके के लिए खर्च किया हैं तो उन्हें फायदा भी हुआ है ............... आज अगर वे इससे बढ़ कर भ्रस्ताचार और काले धन आया वर्त्तमान सरकार के गलत नीतियों के खिलाफ अगर खड़े हैं .. तो सही कर रहे है ...... क्या स्वामी अरविन्द या विवेकानंद याग गुरु नहीं थे .. पर उन्होंने बी भारत की राजनितिक और सामाजिक उथान केलिय आगे बढ कर अपने विचार रखे और लोगो को इसके प्रति जागरूक किया .... साधुवाद आपको .. आपने बिलकुल समसामयिक आलेख लिखा /. कुछ नाम छुट गए .. यथा आसाराम बापू .. ये तो मुझे बेहद धरत भी लगते है .. मिडिया में कई बार इनके आश्रम में न महिलाओ और बच्चो की असामयिक मौत की खबर आई पर तुरंत ही इनको तिल पकरने से पहले ही दबा दिया गया ... सब पैसे का खेल है बाबा .. :)

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

के द्वारा: अजय कुमार झा अजय कुमार झा

आदरणीय अशोक जी, नमस्कार. बधाई के लिए आभार. मैं योग-गुरु रामदेव बाबा के विरुद्ध नहीं हूँ. उनके हालिया राजनैतिक प्रवचन,और व्यावसायिक प्रवृत्ति,मुझे अच्छी नहीं लगी.बाबा अपनी प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि को भुनाने लगे हैं.उनके दिव्य -योग ,और योग-शिविरों में निर्धारित फीस ,सामान्य से चौगुनी से भी अधिक है.हर एक बाबा ट्रस्ट चलाते हैं,कोई सदस्यता के लिए बाध्य नहीं करता.पैसा बढ़ने पर सारे दुर्गुण स्वतः ही साथ लग जाते हैं.महत्वाकांक्षा बढ़ने लगती है,दिल्ली दिखाई पड़ने लगता है.ट्रस्ट की आड़ में भी बड़े घपले होते हैं.उनसे बड़े-बड़े योग शिक्षक हुए हैं.मीडिया ने इन्हें समर्थन दिया,तो इन्हें अपनी मर्यादा भूल गयी.केवल इमानदारी से,इतने कम समय में ,इतना बड़ा साम्राज्य या व्यवसाय नहीं बढ़ सकता.योग-गुरु के रूप में ,उनका मैं आज भी आदर करता हूँ,लेकिन व्यापार या राजनैतिक गुरु के रूप में नहीं.हर आदमी इमानदार है,जब तक उसकी कलाई न खुले.

के द्वारा: omdikshit omdikshit

आदरणीय दीक्षित जी नमस्कार, बाबाओं पर सुन्दर विश्लेष्णात्मक आलेख. आपके विचारों से मै पूरी तरह सहमत हूँ किन्तु क्या आपको लगता है की सिर्फ रुपया पैसा देखकर ही रामदेव जी को अन्य बाबाओं के समकक्ष रखा जा सकता है? मुझे थोड़ा भ्रम है. क्योंकि रामदेवजी प्रवचन देने वाले या तथास्तु कहने वाले बाबाओं से थोड़े भिन्न हैं. इनके यहाँ योग शिक्षा दी जाती है जो ग्रहण कर इंसान अपने स्वास्थ में बढ़ोत्तरी कर सकता है. रुपया पैसा खर्च नहीं करना तो टीवी पर ही देखकर उतना ही लाभ मुफ्त भी प्राप्त किया जा सकता है. कोई भी उद्योग बिना पैसे के नहीं चलता. इस अकाट्य सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता.इनका दवा बाजार यदि फलफूल रहा है तो इसके पीछे लोगों को उन दवाइयों से लाभ होने के कारण ही माना जा सकता है क्योंकि मेरी जानकारी में उनके कोई मेडिकल प्रतिनिधि डाक्टरों के पास जाकर उनकी निर्मित दवाइयां लिखने को नहीं कह रहे हैं. फिरभी लोगों द्वारा उनकी दवाइयों और अन्य उत्पाद खरीदने को मै किसी व्यक्ति की मानसिक विकृति के रूप में नहीं देखता. अन्य बाबाओं का पैसा जहां खुद के घर में जा रहा है वह रामदेव जी के घर परिवार में जाने के समाचार अभी तक सुनने या पढ़ने को नहीं मिले हैं सारा रुपया ट्रस्ट के नाम पर ही है. मेरी विचारों को कतई भी मेरा रामदेव समर्थक या ये कहूँ की अंध समर्थक होना नहीं माने. मै सदैव ही सत्य को सहर्ष स्वीकार करने पर ही विश्वास करता हूँ. आपकी अंत में लिखी व्यंगातमक पंक्ति दैया रे दैया और बाबा रे बाबा ने मन प्रफुल्लित कर दिया. शायद अब बच्चों के मुह से पहले माँ निकला या बा यह जानकर उसके भविष्य के बारे में जानकारी दी जायेगी. आपके अच्छे आलेख के लिए हादिक बधाई.

के द्वारा: akraktale akraktale

आदरणीय ओम जी, नमस्कार, बेरोज़गारी भत्ते की बात पर मैं हमेशा सोचती हूँ कि कभी गृहणियों को बेरोजगारों की श्रेणी में नहीं रखा जाता ...1000 प्रति माह ही सही, कुछ तो मिलता ... भिखारियों की तो आजकल चांदी है....एक लड़की ने भीख नहीं दी , कहा कुछ नहीं है आगे जाओ तो बोला कि अपना नंबर ही दे दो, दुआ के मैसेज करूँगा.... गनीमत है कि इतने महत्वपूर्ण पदों की रिक्तियां औने पौने नहीं भरी जा रही हैं...शिक्षा का ये हाल है कि शोध छात्र भी Ph.d . को p .h .d . लिखते हैं..आप दक्षता के अधर पर रिक्तियां भरने की बात किस के लिए करें गे...जो creme हैं वो तो IIT, CPMT, IAS, IFS आदि परीक्षाओं में निकल ही जाते हैं ...लेकिन कुछ सालों से अब इसमें भी आरक्षण हो गया है...खुद मेरे बच्चे का IIT में सेलेक्शन नहीं हुआ और उससे कम नंबर पाने वाले सहपाठी का अरक्षित सीट पर हुआ तो चिढ कर उसने इंजीनियरिंग छोड़ कर कानून की पढाई शुरू कर दी.. शेष कुशल है....जय हिंद, जय भारत..

के द्वारा: sinsera sinsera

आदरणीय दीक्षित जी सादर नमस्कार, आपके आलेख का अर्थ यदि मै सही समझा हूँ तो आप कहना चाह रहे हैं की बेरोजगारी के नाम पर घर बैठे रुपया देकर निठल्ला बनाने से बेहतर है की योग्यता अनुसार कुछ काम लिया जाए. बिलकुल सही सोच है आपकी.सरकार को एक अच्छी और लम्बी योजना बनाना चाहिए. सफलता के लिए गहन परीक्षण होना चाहिए तब ही इसे लागू किया जाना चाहिए. कुछ काम भी लिया जाए के उदाहरण संविदा भर्तियाँ हैं. जिनके परिणाम आशा अनुरूप नहीं रहे हैं.इसलिए आप की कार्य लेने की सलाह संविदा भर्तियों के माध्यम से अच्छे परिणाम शायद नहीं दे पाएगी इसलिए मै एक लम्बी योजना के बारे में कह रहा हूँ. हमने देखा है की संविदा नियुक्ति पर कम पैसे और गारंटी के अभाव में कर्मचारी मन लगा कर कार्य नहीं करते भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है अच्छी नौकरी मिलने पर बीच में ही कार्य छोड़कर जाने से भी असुविधा होती है. कुछ वर्ष संविदा पर कार्य करने के बाद उम्र के बढ़ने के साथ ही एज्बार होने के भय से कर्मचारी नियमित करने पर जोर देने लगते हैं और हड़ताल शुरू हो जाती है.राजनैतिक दल इसका लाभ भी खूब उठाते हैं. इसलिए मै चाहता हूँ की पूर्ण परीक्षण कर कोई योजना लागू की जाए. आपके सुझाव से मै पूर्ण सहमत हूँ की मुफ्त में दिया जाने वाला रुपया युवा पीढ़ी को बर्बादी की कगार पर ले जाएगा. साधुवाद.

के द्वारा: akraktale akraktale

सादर प्रणाम! यह विचारणीय प्रश्न है कि ……….क्या सरकार के पास काम की कमी है? क्या सरकार ने सभी वर्षों से खाली पड़े पदों को भर दिया है?क्या सभी विद्यालयों में शिक्षको के पद भर दिए गए हैं? क्या सरकारी कार्यालयों में……चतुर्थ श्रेणी या तृतीय श्रेणी के लाखों पद खाली नहीं है?सभी विभागों में,नगर-निकायों में,….अधिकारियों ,इंजीनियरों या चिकित्सकों या ……..उनसे सम्बंधित…….. सभी पदों को भर दिया गया है?……….जी बिलकुल नहीं .आज सभी सरकारी कार्यालयों में, अस्पतालों में,सभी विभागों में ,विद्यालयों,महा-विद्यालयों ,विश्व-विद्यालयों में ……..केवल एक-तिहाई पदों पर ही ……लोग कार्यरत हैं.इससे सारे कार्य,विकास-कार्य अध्यापन कार्य प्रभावित हो रहें हैं……..सरकार चाबुक चलाकर बचे कर्मचारियों,अधिकारियों से काम ले रही है.एक-एक अध्यापक ……दो सौ से तीन सौ बच्चों को पढ़ने के लिए मजबूर हैं……….काम की गुणवत्ता का अंदाज़ आप लगा सकते हैं….हर विभाग के लोगों को, अन्य कार्यों,…जैसे …चुनाव,जन-गणना,,,,,,.जाति-गणना,…..टीका-करण आदि कार्यों में भी लगाया जा रहा है,,,

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

ओम दिक्षित जी महिलायें कहां आगे नहीं हैं ? यह तो अच्छी बात है कि हमारी जन शक्ति बढ रही है. जहां तक लेखन का प्रशन है यह भाव व अभिव्यक्ति का मंच है. चूंकि महिलायें अधिक संवेदन शील होती हैं इसी कारण वह इस मैदान में बाजी मारने में अधिक सक्षम होती हैं. यदि किसी ब्लोग को "Top" पर इसलिये रखा जाता है कि उस पर टिप्पणियां अधिक हैं तो यह नाइन्साफ़ी होती है. कारण यह है कि टिप्पणियां ली और दी जाती हैं. जितनी आप देंगे उतनी आपको मिलेंगी. मुझे लगता है कि कोई एक समिति होनी चाहिये जो इस बात का निर्णय ले कि कविता, कहानी और लेखों में कौन कौन ब्लोगर अच्छा लिख रहे हैं. इससे पाठकों को भी सुविधा होगी. केवल स्तरीय रचनाओं को ही फ़िचर्ड ब्लोग में रखा जाये तभी बात बनेगी. आप के सार्थक प्रसंग ब्लोग पोस्ट के लिये आभार.

के द्वारा: Mohinder Kumar Mohinder Kumar

माफ़ करियेगा, मैं कृष्ण के समकालीन नहीं बल्कि आप खुद को उनके समकालीन होना सिद्ध कर रहे है. यदि आप कृष्ण या और किसी का सहारा नहीं लिए होते तो मैं उस शख्स का जिक्र भी नहीं करता. आपका आलेख बहुत अच्छी तरह से पढ़ा हूँ और आपकी बातों से तबतक सहमत था जबतक कि आप प्रेम और वासना को व्यक्ति विशेष और समय विशेष से न जोड़कर, अपनी बात निष्पक्ष रख रहे थे. परन्तु आप वही पर गलत हो गए जब आप बुराई का विरोध न करके उसे व्यक्ति विशेष और समय विशेष की तुलना करना चाहें हैं.....जबकि यह बुराई कल भी था और आज भी है..................बस थोडा स्वरुप बदल गया है. अभी भी आपको समझ में नहीं आया कि मैं आपकी किस बात का विरोध कर रहा हूँ तो मुझे आपकी बातों पर आश्चर्य होगा,........हाँ एक बात कहना चाहूँगा मुझे सभी लोग अच्छे लगते है बस मुझे बुराई अच्छी नहीं लगाती..........चाहें वो किसी भी रूप में हो.

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

यदि मैं यही बात आप से कहूँ कि आज का सन्दर्भ कि तुलना कल से मत करिए तो यक़ीनन आप की बात गलत हो होगी. अभी कृष्ण और गोपियों के सन्दर्भ की बात कर रहें, क्या आप उस युग में थे? जिस प्रकार कुछ पूर्वज अपवाद की श्रेणी में आते हैं उसी प्रकार कुछ लोगों का प्यार ही वासना या सेक्स की श्रेणी में आते हैं. कृपया सबकी तुलना सबसे मत करिए........एक चीज पता हैं आपको कि इतिहास महान लोगों का ही बनता हैं, आम आदमियों का नहीं. जब उस युग के महान पुरुषों का ये हल हैं तो आम लोग कैसे होंगे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता. मैं यहाँ कृष्ण और कारन को अपमानित नहीं कर रहा बल्कि आप कर रहें क्योंकि मैं जानता हूँ कि कृष्ण का प्रेम वासनारहित था, उस युग के सभी व्यक्तियों का नहीं. उसी प्रकार इस युग में भी कुछ लोगों का प्यार वासनारहित हैं, सबका नहीं तो फिर आप कैसे कह दिए कि उस युग का प्रेम महान था....प्रेम को परिभाषित करना इतना आसन नहीं, जितना आप समझ रहें हैं....मेरी भी एक प्रेमकहानी हैं,इसको आप क्या नाम देंगे. मैं चाहूँगा कि आप इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करें. इसके साथ यह भी चाहूँगा कि किसी से तुलना मत करियेगा क्योंकि प्यार सिर्फ प्यार होता हैं....जहाँ हम तुलना करने लगते हैं वही गलत हो जाते हैं. बुराई का विरोध करिए लेकिन जब तुलनात्मक बात करेंगे तो इससे स्पष्ट हो जाता है कि आप कहीं न कहीं कमजोर हैं या गलत है......लिंक दे रहा हूँ.... http://merisada.jagranjunction.com/2012/02/15/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%BE-%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%81-%E0%A4%B8/

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आदरणीय अनिल जी, नमस्कार. पहले तो मै सार्थक आलोचना के लिए आप को धन्यबाद देता हूँ.एक बात तो स्पष्ट है ,की आप ने मेरे लेख को पूरा मन से पढ़ा है,इसके लिए मैं आप का आभारी हूँ.जहाँ तक मेरी जानकारी है,श्री कृष्ण का राधा या अन्य गोपियों के साथ ,गोकुल में,ऐसा कोई आचरण करने का सन्दर्भ कहीं नहीं है,जहाँ उनके बीच के प्यार को वासना या सेक्स से जोड़ा जाय.मैंने तो इसे सृष्टि के साथ ही जोड़ा है,और यह भी कहा है कि अपवाद उस समय भी थे.जहाँ तक पूर्वजों (संभवतः त्रुटिवश आप द्वारा वंशज का उल्लेख किया गया है)द्वारा किये गए,कुकृत्यों का प्रश्न है,वह 'अपवाद' की श्रेणी में आते हैं.किसी पति द्वारा अपने गृहस्थ धर्म को निभाने के लिए पत्नी के साथ किया गया .......वासना नहीं कहा जा सकता है,लेकिन शादी के पूर्व,अपनी प्रेमिका से प्यार के नाम पर किया जाने वाला.........वासना की श्रेणी में ही आएगा.इसकी तुलना कृष्ण-राधिका या कर्ण की उत्पत्ति से करना उचित नहीं कहा जा सकता.शुरुआती हिस्सा आप को अच्छा लगा,यह मेरा सौभाग्य है.बाद के आधे हिस्से में प्यार या प्रेम के इज़हार के तरीके का तुलनात्मक- उल्लेख किया गया है. एक बार पुनः ध्यान से पढ़ें,आशा है,आप संतुष्ट होंगे.धन्यबाद.

के द्वारा: omdikshit omdikshit

सार्थक और सफल प्रस्तुति........पर आपकी कुछ बातों पर सवाल उठाना चाहूँगा. यदि पहले का प्यार बागों और बगीचों में नहीं होता था तो कृष्ण पुरे गोकुल में बदनाम कैसे हो गए. आज हम उनके प्यार को अध्यातम से जोड़ रहें, उस तत्कालीन परिस्थिति में अध्यात्म से क्यों नहीं जोड़ा गया. हकीकत यह है कि प्यार पर कल भी ऊँगली उठती आई है और आज भी. जैसे-जैसे कृष्ण कि शक्ति सामने आती गयी वैसे-वैसे लोगों का मुंह बंद होता गया. कहा भी जाता है समरथ का न दोष गोशाई. दूसरी बात आप कह रहें है कि प्यार शादी के बाद होता है, पहले ऐसा ही होता था. क्या स्पष्ट करेंगे कि भूतकाल में कर्ण जैसे संतानों की उतपत्ति कैसे हो गयी. आप यह क्यों नहीं कहते कि सेक्स शादी के बाद ही होना चाहिए. जहाँ तक सेक्स और वासना कि बात है वो कल भी था और आज भी है. यदि आप यह कहाँ चाहते है कि यह सब परदे के पीछे करना सही है और परदे के बाहर करना गलत तो मैं दोनों रूपों का विरोध करना चाहता हूँ क्योंकि हमारे वंशज शराफत के चादर ओढ़े बेटी और बहु समान औरतों के साथ परदे के पीछे जो करते आये है वो हकीकत किसी से छुपा नहीं हैं. जब आप करे तो रासलीला और हम करें तो करैक्टर ढीला.....मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि बुराई किसी भी रूप में हो, किसी भी युग में हो, कही भी हो; उसका विरोध होना चाहिए न कि विशेष युग, विशेष वर्ग और विशेष स्थान का.......आप अपने इस आलेख के शुरुवाती आधे हिस्से में सही लगे. परन्तु बाकि के आधे हिस्से में विषय वस्तु से भटकते हुए नजर आये है...फिर से विश्लेषण कीजिये....और अंत में मैं आपसे न्यायसंगत और शुद्ध विचार रखने की आशा करता हूँ.......हार्दिक आभार.

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: omdikshit omdikshit

जागरण-जंक्शन की भी एक बोल्ड महिला लेखिका ने अभी हाल ही में …..एक प्रचार में …..नंगी महिला को सब्जियों के साथ लेटे हुए….. दिखाया,जिसको न चाहते हुए भी देखना पड़ा,और उनके ” बोल्डनेस” की तारीफ करनी पड़ी.तारीफ करने वाले अधिकांश पुरुष हैं… . हरिओम तत्सत! उन महान लेखिका का भी यही विचार था --- लेख को समझाने के लिए सब्जी के पलते को तड़के के साथ दिखाना जरूरी था. आजकल जागरण जंक्सन में भी तस्वीरों के साथ (फेसबुक की तर्ज़ पर) अपनी बात को समझाने का प्रचलन बढ़ गया है शायद इसीलिये सम्मानित लेखक अपना दामन बचने के लिए किनारा कर रहे हैं! बेहतर प्रस्तुति के लिए बधाई! और आभार! आपको भी नव वर्ष की ढेर सारी शुभकामना!

के द्वारा: jlsingh jlsingh