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सर्वोच्च न्यायालय को ही आगे आना होगा....

Posted On: 18 Feb, 2013 Others,न्यूज़ बर्थ में

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समाचारों में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य -न्यायाधीश न्याय -मूर्ति अल्तमस कबीर के विचारों को सुनकर बहुत अच्छा लगा कि ..’न्याय में देरी इंसाफ़ से इंकार करना है’ .उनके द्वारा दिल्ली सामूहिक-दुष्कर्म के सन्दर्भ में …न्याय को लेकर लोगों में आई जागरूकता को शुभ सन्देश …बताया गया.यह कोई नयी बात नहीं है ,…जब किसी न्यायमूर्ति द्वारा ..न्याय में होने वाली देरी को उचित नहीं ठहराया गया है,लेकिन विचारणीय-बिंदु यह है कि ..आखिर यह देरी होती क्यों है?किसके स्तर से और क्यों यह विलम्ब होता है?क्या इसके लिए नीति-निर्धारक दोषी हैं या कानूनी प्रक्रिया का भागीदार?वादी दोषी या प्रतिवादी?कानून के जानकार और विधि-विशेषज्ञ दोषी हैं या अधिवक्ताओं का समूह?विधायिका दोषी है या कार्यपालिका ?जिसका भी दोष हो ,क्षति तो हमारी याने कि न्याय का गुहार लगाने वाले की ही होती है.हम शासन-प्रशासन से न्याय न मिलने की दशा में थक हार कर न्यायलय की शरण में जब पहुँचते हैं,तो लगता है कि यहाँ ….न्याय-मंदिर….में ज़ल्द से ज़ल्द इंसाफ़ मिल जायेगा ,लेकिन जब न्यायिक -प्रकिया की जटिलता सामने आती है ,तो धीरे -धीरे मन का धैर्य टूटने लगता है,न्याय की आशा धूमिल होते देख …आँसुओं के सिवाय कोई साथ नहीं देता. मन से एक आह सी निकलती है कि…..क्या न्याय के इस मंदिर में बैठे ..ज़ज रुपी भगवान भी ज़ल्दी न्याय न करने में मजबूर हैं?हम तो असहाय होकर ,थक-हार कर इस मंदिर में आये ,लेकिन यहाँ भी कोई सुनवाई नहीं होती और न्याय शीघ्र नहीं मिलता तो बस एक ही रास्ता बचता है……जो स्वर्ग की ओर जाता है.
न्याय में विलम्ब होने पर कई एक दुष्परिणाम देखने को मिलते हैं.सबसे नवीनतम ..उदहारण है….एक्स-एयर होस्टेस .गीतिका की हत्या और अब उसकी माँ ..अनुराधा शर्मा का,जो जेल में बंद …गोपाल कांडा के गुर्गों द्वारा मुकदमा वापस लेने के बढाते दबाव के कारण , आत्म-हत्या करने को मजबूर हो गयीं.नितीश कटारा हत्याकांड के दोषी विकास यादव &कंपनी को सजा दिलवाने के लिए उसकी माँ ने अपनी जान पर खेल कर पैरवी की.अंततः विलम्ब से ही सही,इंसाफ़ मिला,लेकिन इसके लिए उन्हें कई वर्षों तक ज़मीन-आसमान एक करना पड़ा,क्या-क्या पापड़ नहीं बेलने पड़े नितीश की माँ को?ऐसे अनेकों मामले हैं.दिल्ली-दुष्कर्म के मामले में उठी जनता की आवाज से कम से कम यह तो हुआ ही है कि…बलात्कार के मामलों का निस्तारण तेज़ी से होने लगा है,लेकिन क्या यही शीघ्रता पहले नहीं हो सकती थी?अभी भी दुष्कर्मियों के हौसले कम नहीं हुए हैं.रोज़ ही समाचारों दस-बारह रेप के मामले आ ही जाते हैं.चाहे गाज़ियाबाद में तीन साल की बच्ची के साथ बलात्कार हो या सौतेली बच्ची का उसके बाप द्वारा बलात्कार हो.जब तक ऐसे स्पष्ट मामलों में त्वरित-निर्णय नहीं होगा तब तक ऐसे अपराधों में कमी नहीं आयेगी.ऐसे अपराधी को मृत्यु-दंड भले ही न दिया जाय लेकिन सजा इतनी कठोर हो कि सभी अपराधी ,अपराध करने के पहले सौ बार सोचें.जघन्य आपराधिक दुष्कर्म के मामलों में उच्चतम -दंड दिया जाना चाहिए.प्रत्येक मामले में ऐसे अपराधियों को निर्धारित समय-सीमा में ही अपने को निर्दोष साबित करने का समय अवश्य दिया जाना चाहिए,ताकि केवल द्वेष -वश ,फंसाए गए लोग दण्डित न हो जांय.
यहाँ यह अवश्य देखना होगा कि,न्यायालयों को ,आपराधिक,सिविल ,राजस्व एवं विविध ,आदि श्रेणी में बाँट कर ,तीन माह से अधिकतम तीन वर्षों की समय सीमा में बाँधना चाहिए.चूँकि माननीय उच्च न्यायलयों एवं सर्वोच्च न्यायलय को समय-सीमा में बाँधने में कोई प्रशासनिक या कार्यकारी अधिकारी सामने नहीं आ सकताऔर विधायिका द्वारा भी, राजनैतिक स्वार्थ -वश या नेताओं द्वारा किये जा रहे अपराधों में ,अधिक से अधिक समय तक निर्णय को लंबित रखने के उद्देश्य से,कोई कदम नहीं उठाये जायेंगे ,अतः माननीय सर्वोच्च न्यायलय द्वारा ही कोई ठोस कदम उठाना होगा.
सबसे बड़ी बाधा न्यायिक- अधिकारियों और न्यायाधीशों की कमी और बढ़ते वादों की है.सूचना-श्रोतों ,से यह ज्ञात होता है कि अकेले सर्वोच्च -न्यायलय में एक फ़रवरी २०१३ को ६६६५९ मामले लंबित थे,जिसमे से २९२०६ मामले नियमित सुनवाई के लिए शेष विविध मामले एडमिशन स्तर पर थे.इसमें केवल १४१२६ मामले सुनवाई के लिए तैयार हैं,जिनमे सुनवाई की तारीखें लगी हैं या लगनी है.शेष लगभग ६२%मामले अपूर्ण या दोष-पूर्ण हैं,जबकि एक अगस्त २०१२ को यह संख्या लगभग ६३% थी.वहीँ कुल मामले ६३३४२ और सुनवाई हेतु तैयार मामले १२४४७ थे.एक फरवरी को लंबित मामलों में से ४४ मामले संविधान-पीठ के और १५८ मामले संदर्भित हैं.स्वाभाविक है की न्याय-मूर्तियों की वर्तमान संख्या इसे निर्धारित समय-सीमा में नहीं निपटा सकती है.इसके अतिरिक्त रोजाना स्वतः-संज्ञान के ,विशेष-मामले ,अलग हैं.माननीय उच्च -न्यायालयों की हालत तो और भी ख़राब है.केवल इलाहाबाद उच्च-न्यायलय में लाखों की संख्या में लंबित मामलों के लिए वर्तमान में मात्र ७१(मेरी जानकारी के अनुसार)न्यायाधीश हैं जबकि स्वीकृत पद १६० हैं .यह स्थिति तब है जब सभी मामले यहाँ नहीं आते हैं..अधीनस्थ-न्यायालयों की दशा तो और भी सोचनीय है.तो ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि …आखिर शीघ्र-न्याय कैसे मिलेगा?मेरा यह मत है कि इसके लिए माननीय सर्वोच्च -न्यायलय को ही पहल करनी होगी,क्योंकि आपराधिक-छवि के लोग या नेता तो यही चाहेंगे कि मुक़दमा अनंत-कल तक चलता रहे और लालू यादव,मायावती,मुलायम सिंह,राजा और पी.जे.कुरियन(१७ वर्षीय बालिका,सुर्यनेल्ली के बलात्कार में आया नाम),राज्य सभा सदस्य आदि ,जैसे लोग मज़े करते रहें.
मेरे विचार से, इसके लिए यह भी आवश्यक है कि न्यायिक-अधिकारियों की भर्ती के लिए अलग चयन-आयोग हो,जिस पर पूरा -नियंत्रण मान.सर्वोच्च न्यायलय द्वारा गठित समिति का हो.यह इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि यू.पी.एस.सी.या राज्य सेवा आयोगों के पास समय ही नहीं है.प्रत्येक श्रेणी के वादों के निपटारे के लिए ,समय-सीमा निर्धारित करने हेतु न्यायाधीशों की समिति बनायीं जाय,अथवा विधि-आयोग को ,शीघ्र-अनुशंसा हेतु निर्देशित किया जाय.फ़ास्ट-ट्रैक न्यायालयों की संख्या शीघ्रता से और बढाई जाय.अधिवक्ताओं और वादी या प्रतिवादी द्वारा अधिकतम तीन बार स्थगन की प्रार्थना स्वीकार की जाय,वह भी समय-सीमा को ध्यान में रखते हुए.यह मेरे अपने सुझाव हैं ,आप के सुझाव क्या हैं?
जय हिन्द! जय भारत!!

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23 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

akraktale के द्वारा
February 23, 2013

आदरणीय दीक्षित साहब सादर, न्याय प्रक्रिया में विलम्ब को अब एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है. किन्तु आज जब शासन में अधिकाँश नेता दागी छवि के हों तब वे इसे ख़त्म करने में भी क्योंकर रूचि लेंगे.

    omdikshit के द्वारा
    February 23, 2013

    आदरणीय अशोक जी, नमस्कार. सही कहा आप ने.इसका हल यही सूझ रहा है कि सर्वोच्च-न्यायालय को ही पहल करना चाहिए.सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिय धन्यबाद.


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