AAKARSHAN

EK DARPAN

53 Posts

1189 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 7034 postid : 283

क्योंकि .....रोज़ भूख लगती है!

  • SocialTwist Tell-a-Friend

भूख!…..भूख!!….और भूख!!! इससे, शायद ही कोई अपरिचित हो.सभी जीव-जंतु ,कीड़े-मकोड़े हों या मनुष्य,या अन्य प्राणी, सभी को भूख लगती है और इसकी अनुभूति केवल उसी को होती है ,जिसे भूख लगती है.. इसका ….वास्तविक एहसास …उनसे पूछिए ! ….जिनके पास पैसा नहीं होता है अथवा साधन नहीं होता जिससे वह अपनी …क्षुधा को शांत कर सके .मैं राज -नेताओं की भूख की बात नहीं करता ,क्योंकि उनके भूख की तो कोई सीमा ही नहीं होती.मैंने देखा है , ऐसे गरीबों को.
बात काफी पहले की है.लगभग बीस साल हो गए.मेरे अपने गाँव की बात है.मेरे घर पर कोई आयोजन था,जिसमे सैकड़ों लोग जमा थे.होता भी है क्योंकि गांवों में जब कोई आयोजन होता है तो आस-पास के गाँव वालों को भी ….’.झारा-नेवता’…दिया जाता है ,जिसका मतलब होता है कि….सभी लोग सपरिवार बुलाये जाते हैं, ऐसे में संख्या स्वाभाविक रूप से …हजारों में पहुँच जाती है.सब लोग खा-खा कर उठते जा रहे थे.उनके द्वारा ….पत्तलों में ,खाने से ज्यादा नुकसान करने के उद्देश्य से, …पूड़ी,सब्जी एवं मिठाई आदि…छोड़ दी जा रही थी.जिसे उठाकर थोड़ी दूर किनारे की तरफ फेंका जा रहा था.वहां कुछ अँधेरा था.उधर से पत्तलों के बीच …कुछ ..खर-खराहट की आवाज़ आई,तो मेरा ध्यान उधर चला गया.पहले तो लगा कि ….कोई जानवर है,लेकिन थोड़ा ध्यान से देखने पर लगा कि ….दो बच्चे हैं,जो उन पत्तलों में से मिठाई और पूड़ी निकाल रहे थे.मैं उधर जब गया तो वे डर के भागने लगे.मैंने उन्हें रोका …पूछा कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं?जब पूरे गाँव को खाने के लिए बुलाया गया है ,तो जूठे में से क्यों उठा रहे हैं?एक बच्चा डर कर बोला कि वह ….दूसरे गाँव के मुसहर (प्रायः गाँव में दोना-पत्तल बनाने वाले)…हैं.इसे ले जायेंगे तो….उनके और भाई लोग खा लेंगे.सच मानिये! गला भर आया,आँखें नाम हो गयीं.फिर मैंने उन्हें बुलाकर खाना खिलाया और घर ले जाने के लिए भी दिया.बच्चे बहुत खुश हुए.ऐसी बहुत सी घटनाएँ ….आप के सामने भी आती होंगी.हम जब पढ़ते थे ,तो प्रायः कोई न कोई भिक्षा मांगने आ जाता था …और बाकायदा घंटी बजा कर या कुछ न कुछ ….पंक्तियाँ सुना कर भीख मांगता था.मेरे पिता जी, यद्यपि सरकारी सेवा में तृतीय श्रेणी के पद पर ,पूर्वी-उत्तर प्रदेश के ,देवरिया जिले में,कार्य-रत थे,लेकिन उन्हें या अम्मा को यह अच्छा नहीं लगता था कि….. कोई उनके दरवाजे पर आये और भूखा लौट जाए.धीरे -धीरे ऐसे लोगों के आगमन और बारम्बरिता में वृद्धि होने लगी.बचपना था.बार-बार हम्ही लोगों को ले जाकर कुछ न कुछ खिलाना पड़ता था. कभी-कभी तो मन खीझ जाता था.अपने लिए जब कोई कमी होती थी और पिता जी से ,दान की बात …कही जाती थी,तो पिता जी यही कहते थे…हमारी कमाई में उनका भी अंश है,यह सौभाग्य की बात है कि हम उनका अंश उन्हें ही दे रहे हैं.हम बड़े शर्मिंदा महसूस करते थे.फिर क्या था?कभी …बादल कवि,कभी ….’अब न करबे भोला के नोकरिया ,…डेराला ..जियरा..’गाते हुए साधू बाबा और ….ब्राम्हण को धन केवल भिक्षा …कहते हुए बाबा जी, बार-बार दर्शन देने लगे.एक वृद्ध ,छोटे कद के ,गोसांई बाबा, तो हर दूसरे-तीसरे दिन आने लगे.उन्हें भर पेट भोजन कराना ही पड़ता था.आखिर मैंने जब देखा ..कि आज अम्मा भी घर के अन्दर हैं,अच्छा मौका है,मैंने तुरंत गोसांई बाबा से तमतमाते हुए ..प्रश्न जड़ दिया…बाबा ! आप रोज़-रोज़ क्यों चले आते हैं?बाबा ने मेरी तरफ देखा और शांत भाव से खाते रहे.फिर पानी पिए और हाथ-मुंह धोकर व पोंछ कर बोले ….
.”क्योंकि रोज़ भूख लगती है , बच्चा!,क्या करें?खूब पढो-लिखो ,सदा खुश रहो.फिर !बाबा नहीं आये.मुझे बड़ा अफ़सोस हुआ था.रोज़ यही होता था ….कि बाबा क्यों नहीं आये?लगभग एक वर्ष के बाद बाबा पुनः आ गए.ऐसा लगा कि ……अपने परिवार का कोई सदस्य वापस आ गया हो.बाबा को खाना खिलाया ,और पूछा बाबा ..इतने दिन कहा थे?क्यों नहीं आये ?बाबा ने कहा…’उनके पास जाता था ,जिन्हें यह नहीं बताना पड़ता था…. क्योंकि ….रोज़ भूख!लगती है?मैं दोबारा शर्मिंदा हुआ ,और माफ़ी माँगा.और भी बहुत सी घटनाएँ हैं.
प्रश्न यह है की आखिर! इसके लिए कौन दोषी है?क्या हमारे समाज का दोष नहीं है?क्या उन माँ-बाप का दोष नहीं है जो अपने साधनों की अनदेखी कर चार ,छ: और दस ,बारह बच्चे केवल इसलिए पैदा करते-रहते हैं कि उनके धर्म के अनुसार इस पर कोई रोक नहीं हो सकता, या उनकी जाति के ठेकेदारों ने आबादी बढ़ाने पर जोर दिया है,अन्यथा …हुक्का-पानी बंद हो जायेगा?क्या वे सभी नेता ,राज-नेता दोषी नहीं हैं जो जाति के या धर्म के आधार पर जन-गणना की हिमायत तो करते हैं लेकिन केवल वोट की राजनीति के लिए?बड़ी-बड़ी योजनायें बनाई जाती हैं,रुपयों को आवंटन किया जाता है और उसकी बन्दर -बाँट कर ली जाती है.मनरेगा हो या जे एन यू आर एम,गरीबों के लिए आवास हो या आंबेडकर-ग्राम अथवा लोहिया -ग्राम,सब को लूट -योजना में परिवर्तित कर दिया जाता है.क्यों कोई यह नहीं सोचता कि गरीबों या जनता का हित हो?.किसी भी जाति,धर्म या सम्प्रदाय का हो उसे भीख क्यों मांगनी पड़े?क्यों नहीं सरकार उनके लिए कोई कारगर योजना बनाती और उसे क्रियान्वित करती है?क्यों आज देश में करोड़ों बच्चे …..कुपोषण और भूख से मरते हैं?क्यों उन नौनिहालों को भीख मांगना या कूड़े के ढेर में भोजन तलाशना पड़ता है?किसके कारण ये बच्चे चोरी या डकैती,लूट और हत्या करने की ओर अग्रसर होते हैं?आखिर इसमें उनका क्या दोष है?
यद्यपि भूख की यह समस्या केवल भारत की नहीं है.भिखारी अमेरिका और यूरोप में भी होते हैं.यूरोप यात्रा के दौरान ,बेल्जियम ,फ़्रांस और इटली में भी गोरे भिखारी देखे गए लेकिन उन्हें ….रूमानिया का बताया गया.एफ.ए.ओ.के एक अनुमान के अनुसार, लगभग साठ लाख बच्चे ,पूरे विश्व में,भूख से या कुपोषण से मरते हैं,यद्यपि कुपोषण की अपेक्षा भूख से मरने वालों की संख्या कम है.नोबेल पुरस्कार पाने वाले डा० अमर्त्यसेन ने कहा था कि….. भूख की समस्या खाद्यान्न की कमी के कारण न होकर ,सरकार की गलत नीतियों और दोष-पूर्ण वितरण-प्रणाली के कारण है.एक अध्ययन के अनुसार अमेरिका में लगभग पचीस लाख बुज़ुर्ग भूख के कगार पर हैं और साढ़े सात लाख भूखमरी के शिकार हैं. भारत में एक अध्ययन के अनुसार लगभग 38 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं.कुछ आंकड़ों के अनुसार तो यह संख्या 46 करोड़ है.जो भी हो ,एक बात तो सत्य है की भारत की जनता की चिंता किसी दल को नहीं है.सब अपनी-अपनी रोटियां सेंकने में लगे हैं.चुनाव आने वाला है.केंद्र और राज्य सरकारों ने लोक-लुभावन योजनाओं की घोषणा शुरू कर दिया है.इतनी अधिक योजनाए है कि लखनऊ और दिल्ली में बैठ कर …रिमोट से ‘श्री गणेश’ करना पड़ रहा है.विगत चुनावों की घोषणाओं का कोई पूछन-हार नहीं है.कोई दो रुपये किलो चावल तो कोई पूरे परिवार को भर-पेट भोजन का आश्वासन दे रहा है,कोई खाद्य-सुरक्षा बिल पास कर रहा है.प्रधान-मंत्री के लिए अभी से घमासान मचा हुआ है. शादी से पहले ही बच्चों के नामकरण पर बवाल किया जा रहा है.लेकिन अभी तक कोई ऐसा दल सामने नहीं आया है,जिसने गरीबी ,भूख -मरी या भिक्षाटन को समाप्त करने की कोई ठोस और कारगर योजना प्रस्तुत किया हो.जनता और गरीबों को किसी दल ,मुख्य-मंत्री और प्रधान-मंत्री से क्या लेना-देना?उन्हें तो बस ऐसा शासन चाहिए जो उन्हें ..बदहाली ,गरीबी और भूख-मरी से बचाए …..क्योंकि (उन्हें) रोज़ भूख लगती है!
जय हिन्द I जय भारत II .
opdikshit @ gmail . com

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

12 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

alkargupta1 के द्वारा
May 8, 2013

आदरणीय दीक्षित जी , आपकी इस पोस्ट पर कमेन्ट नहीं पहुँच रहे हैं शायद स्पैम में जा रहे होंगे कृपया चेक करें ….. धन्यवाद

    omdikshit के द्वारा
    May 8, 2013

    आदरणीया अलका जी, नमस्कार. इस लेख को मैंने 16 अप्रैल को पोस्ट किया,लेकिन यह 21 तक कहाँ रुका था,कुछ समझ में नहीं आया.मैंने फीड-बैक में शिकायत भी किया,लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं आया है.आप के सहयोग के लिए धन्यबाद.

manishsingharaghav के द्वारा
April 28, 2013

आदरणीय ओम जी , सादर नमस्कार आपने मेरे लेख ” औपचारिक होती ….” पर प्रतिक्रिया दी । ओम जी मैं आपको एक बात बता देती हूँ कि हर चीज का जिम्मेदार हमारा मीडिया नहीं है । मीडिया तो सभी तरह के कार्यक्रम दिखाता है अगर वह फालतू के प्रोग्राम दिखाता है तो आप ये क्यों भूलते हैं कि वह सत्संग या धार्मिक कार्यक्रम भी तो दिखाता है। ये तो जनता के ऊपर निर्भर करता है कि वह क्या देखना पसंद करती है । ओम जी आप अख़बार उठाकर देखिए जितनी भी दुष्कर्म की घटना हो रही है वे सब शराबियों द्वारा हो रही हैं । नशे में ये मानसिक सन्तुलन खो बैठते हैं । जब तक नशे पर सख्ती से पाबंदी नहीं लगेगी तब तक दुष्कर्म की घटनाएँ नहीं रुकेंगी । मुझे पूरा यकीन है जो टिप्स मैंने दिए हैं अगर उन पर अमल किया जायेगा तो हमारे समाज में इस तरह की घटनाओं में जरुर कमी आएगी ।

    omdikshit के द्वारा
    April 29, 2013

    आदरणीया मनीषा जी, आप का कथन बिलकुल सही है.लेकिन ऐसे भी दुष्कर्मी रहे हैं ,जो शराब नहीं पिए थे.आप के टिप्स गलत नहीं हैं. आप की प्रतिक्रिया मेरे ब्लाग पर आई है ,लेकिन आप ने इस लेख पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिया आप ने.इससे यह लगता है कि आप के ब्लाग पर मेरी प्रतिक्रिया ,से आप बहुत ही क्रोध में हैं.

s.p.singh` के द्वारा
April 27, 2013

भैय्या दीक्षित जी आपकी व्यथा बहुत ही मार्मिक है – आपने स्वयं ही व्यक्त किया है नेताओं की भूख बड़ी अजीब है उनको पेट की क्षुधा नहीं होती है उनको मन की अशांति की भूख होती है जिसमे सबसे अलग दिखने की भूख विदेशी बैंकों में धन जमा करने की भूख और न जाने कितने किस्म की भूख जिनका वर्णन करना भी सही नहीं है. ? लेकिन हमारे देश में जो भूखमरी है उसका सबसे बड़ा कारन धन संपदा का असमान वितरण जहाँ एक कारखाने का मालिक केवल धन लगा कर मजदूरों के द्वारा सामान तैयार करवा कर इतना प्रॉफिट कमाता है जिसका अनुमान साधारण व्यक्ति नहीं लगा सकता – और दूसरा सबसे महत्त्व पूर्ण कारन मेरी समझ में शिक्षा का अभाव क्योंकि सरकारी गलत नीतियों के कारण जो स्कूल कालेज विद्यालय – शिक्षा के मंदिर कहलाते थे आज कमाई करने का मुख्या साधन बन गए है इस लिए – :

    omdikshit के द्वारा
    April 29, 2013

    आदरणीय सिंह साहब,नमस्कार. आप ने बहुत सही बात करके मेरे विचारों को गति प्रदान किया है.धन्यबाद.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
April 26, 2013

बस ऐसा शासन चाहिए जो उन्हें ..बदहाली ,गरीबी और भूख-मरी से बचाए …..क्योंकि (उन्हें) रोज़ भूख लगती है! आदरणीय दीक्षित जी , सादर अभिवादन. फेस बुक पर आइये. काश ऐसा हो जाए में आपके विचारों का हार्दिक स्वागत एवं समर्थन करता हूँ. सादर

    omdikshit के द्वारा
    April 27, 2013

    आदरणीय कुशवाहा जी, नमस्कार. धन्यबाद.फेस-बुक पर मैं पहले से हूँ.

rekhafbd के द्वारा
April 26, 2013

आदरणीय ओम जी ,जनता और गरीबों को किसी दल ,मुख्य-मंत्री और प्रधान-मंत्री से क्या लेना-देना?उन्हें तो बस ऐसा शासन चाहिए जो उन्हें ..बदहाली ,गरीबी और भूख-मरी से बचाए …..क्योंकि (उन्हें) रोज़ भूख लगती है!.सार्थक पोस्ट ,आभार

    omdikshit के द्वारा
    April 27, 2013

    आदरणीया रेखा जी, बहुत धन्यबाद.

nishamittal के द्वारा
April 26, 2013

सरकारी योजनाओं का निर्माण उनके लिए नहीं होता जिनको भूख लगती है अपितु उनके लिए होता है जिनको चिकित्सक खाने को मना करते हैं,क्योंकि खा खा कर उनको स्थायी रूप से अपच हो चुका है

    omdikshit के द्वारा
    April 27, 2013

    आदरणीया निशा जी, नमस्कार. बहुत-बहुत धन्यबाद.मैंने यह ब्लाग 16 अप्रैल को पोस्ट किया था,लेकिन यह 21 तक कहाँ रूका रहा ,कुछ समझ में नहीं आया.


topic of the week



latest from jagran