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EK DARPAN

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आवाज़ दो! ....हम!!.. एक हैं!!!....

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किसने सोचा था कि…..एक दिन ..,’.मियां की जूती… मियां का सर ‘…..वाली कहावत चरितार्थ होने वाली है.काश! यदि यह पता होता कि …….संसद द्वारा पास किया गया कानून ….एक दिन उनके ही विरुद्ध प्रयोग किया जायेगा तो…….सूचना के अधिकार 2005 …का बिल संसद में पास ही नहीं होने दिया जाता.यह तो बनाया गया था कि ….जनता के जागरूक लोग इसी में उलझे रहें..कम से कम …..एक वर्ष तो यह समझने में लग जायगा कि …..आखिर यह क्या बला है?…किसके विरुद्ध इसका प्रयोग किया जाएगा?..कैसे इसका प्रयोग किया जाएगा ? कहाँ प्रार्थना-पत्र देना होगा? कैसे और कब …इसका उत्तर मिलेगा?यदि 30 दिन में भी ……उत्तर नहीं मिला तो?….. फिर किसका दरवाजा खटखटाएंगे?…फिर क्या ? इसके बाद क्या? और फिर उसके बाद क्या?जनता का ध्यान ….मंहगाई और राज-नेताओं के भ्रष्टाचार …की ओर से हटाने और …..सरकारी अधिकारियों की कारस्तानियों को उजागर करने ….में उलझाने की यह सोच …उल्टा उन्हीं के गले की हड्डी बन जायेगी , यह बात यदि ..जरा भी ध्यान में आती ,तो कम से कम …….धारा 2 .एच ..तो हटा ही दिया होता..या कम से कम ….सांसदों ,विधायकों के साथ …राजनीतिक पार्टियों को तो …..अपवाद की श्रेणी में या विशेष अधिकार के तहत ….इसकी पंहुच के बाहर तो कर ही दिया होता! और विरोधी पार्टियों के भी …दुलारे बन गए होते और उनकी वाह-वाही भी लूट लेते.
केन्द्रीय सूचना आयोग के 53 पेज के एक फैसले से सभी राजनैतिक पार्टियाँ सकते में आ गयी हैं.सभी बड़ी पार्टी के नेता इससे पल्ला झाड़ने लगे हैं. आखिर ऐसा क्या कह दिया .केन्द्रीय .सूचना आयोग के तीन सदस्यों ने, अपने निर्णय में?क्या जरूरत थी इस तरह के निर्णय की ? क्या आधार था,इस निर्णय का?जिसने राजनैतिक पार्टियों को अपने किये पर पछतावा हो रहा है?सूचना आयोग ने …अपने निर्णय में यह कह दिया है कि ….राजनैतिक-पार्टियाँ एक सार्वजनिक -प्राधिकरण हैं,जो सरकार से किसी न किसी रूप में लाभ प्राप्त करती हैं.इसलिए ,सूचना के अधिकार कानून के अंतर्गत,मांगे जाने पर ,.इन्हें सूचना देना होगा……होता यह है कि ..इन्हें आयकर अधिनियम की धरा 13 -क के अंतर्गत पूर्ण रूप से छूट मिलती है,इनके कार्यालयों के लिए सरकार द्वारा सस्ते दरों पर भवन उपलब्ध कराये जाते हैं ,सस्ते दरों पर या निःशुल्क सभा करने के लिए स्थान उपलब्ध कराये जाते हैं,चुनाव के दौरान इन्हें मुफ्त में संचार-माध्यमों,आकाश-वाणी और दूरदर्शन , का उपयोग करने तथा मुफ्त में पब्लिसिटी करने की सुविधा दी जाती है.आयोग ने यह भी कह दिया है कि सभी राजनैतिक दल …छः सप्ताह में जन-सूचना-अधिकारियों को नामित कर दें और साथ ही धारा-4 के अंतर्गत स्वैच्छिक घोषणा का भी पालन करें.
यद्यपि यह आदेश ,देश की केवल छह पार्टियों के सन्दर्भ में है,जो दो सूचना- सक्रिय जनों की याचिका में उल्लिखित हैं.इनमे कांग्रेस,भाजपा,एनसीपी,सीपीआई ,सीपीएम और बसपा शामिल है,लेकिन वे सभी राष्ट्रीय दल जो ऐसे लाभ प्राप्त करते हैं ,भी इसके दायरे में आ सकते हैं.अभी हाल तक आर.टी.आई.का ढिंढोरा पीटने वाली ,कांग्रेस तथा कुछ अन्य दलों ने इसके अंतर्गत आने से मना कर दिया है.इसे लोक-तंत्र पर कुठाराघात की संज्ञा दी गयी है.टी एम सी के एक नेता तथा कुछ अन्य दलों के नेताओं ने तो यहाँ तक कह दिया कि …दल कितने -कितने लोगों को सूचना देंगे?लाखों लोगों को कहाँ तक सूचना देते रहेंगे?…..ना बाबा …ना! …वैसे भी आयकर-विभाग और चुनाव आयोग को सूचना दी जाती है,लोग वहां से प्राप्त कर सकते हैं.अरुण जेटली ने इसे गलत नहीं बताया है,ममता बनर्जी ने इसे सही बताया है.आम आदमी पार्टी तो बहुत खुश है, लेकिन अभी बसपा ने चुप्पी साध रक्खी है.कम्युनिस्ट -पार्टी (सभी) ने इसका विरोध किया है,जदयु आदि ने तो खुल कर बोला ही नहीं.मुलायम सिंह जरूर कुछ बुद-बुदाये.सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो यह है कि ,व्यापारियों और कंपनियों के ऊपर छत्तीस विभागों में जबाबदेही , एवं निजी विभागों से प्रतिमाह सूचना देने की बाध्यता थोपने वाले ,आज क्यों तिलमिला रहे हैं?.सरकारी विभागों पर ,काम से ज्यादा विवरणों के लिए बाध्य करने के बाद भी ,हर माह हजारों की संख्या में ,सूचना के अधिकार के अंतर्गत मांगे जाने वाली ,सूचना देने की बाध्यता थोपने वाले खुद क्यों घबड़ा रहे हैं? ये नेता क्या चाहते हैं ?सांसद और विधायक के विशेषधिकार की आड़ लेकर कब-तक ये जनता के साथ धोखा-धड़ी करते रहेंगे?कब-तक अपने काले- धनों को …चंदा, दिखाकर ये नेता धन-उगाही के , अपने काले-कारनामों पर पर्दा डालने का प्रयास करेंगे?जनता के प्रति सीधे जिम्मेदारी से ये कब-तक बचते रहेंगे?राजनीति की आड़ में अपने घिनौने रूप को कब-तक जनता के सामने आने से छुपायेंगे ?अब समय आ गया है कि जनता इनको नंगा कर सकेगी.
जो भी हो इन , दलों और नेताओं के ऊपर कोई असर नहीं होने वाला है.ये अपने को सबसे ऊपर मानने के आदी हो गए हैं.तभी तो एक दूसरे की ओर आस भरी नज़रों से देख रहे हैं और इस जुगाड़ में लग गए हैं कि कैसे सूचना आयोग को उनकी सीमा का बोध करा दिया जाय?यह कोई कठिन भी नहीं है ,क्योंकि पहले भी ऐसे कई मुद्दे आ चुके हैं,जिस पर ये सभी एक दूसरे से गले मिल जाते हैं और जनता और कानून को धता बताते हैं.चाहे आरक्षण का मुद्दा हो ,सांसदों और विधायकों के ,वेतन बढाने का बिल हो या क्रीमी-लेयर की सीमा को अजगर की तरह फ़ैलाने की बात हो ,इनमे हमेशा एका दिखाई पड़ती है और सभी दल के लोग ….एक ही प्लेटफार्म पर खड़े होकर ….शान से नारा लगते हैं ….

.आवाज़ दो!….हम!!… एक हैं!!!

जय हिन्द ! जय भारत!!

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

achyutanandpandey के द्वारा
June 15, 2013

प्रिय दीक्षित जी आपने उन सभी पहलुओं को छुआ है जो आज ज्वलंत हैं |यह सही है की सभी पार्टियाँ दिखाने के लिए कैट फाइट करती है लेकिन वेतन, भत्ता तथा उनके स्वार्थ पूर्ति वाले मसलों पर एक स्वर में बोलती है |जबाबदेही से बचने के लिए फिर एक हो गयी हैं | धन्यवाद ऐसे ही बिचार देते रहें |

    omdikshit के द्वारा
    June 15, 2013

    बहुत-बहुत धन्यबाद,पाण्डेय जी.

anilkumar के द्वारा
June 11, 2013

प्रिय दीक्षित जी , केन्दीय सूचना आयोग ने इन राजनीतिक दलों को दर्पण दिखा दिया है । जिसमें  इन सबको अपना विकृत चेहरा दिखाई दे रहा है । इस लिये यह इतना उछल कूद रहे हैं और एकजुट  हो रहे हैं । यह सब मिल कर इस दर्पण को तोडने की कोशिश करेंगे , और यदि तोड नहीं पाये तो इस  पर पर्दा डालने की कोशिश करेगे । परन्तु अपना चेहरा नहीं बदलेंगे । एक अच्छी और सामयिक रचना देने के लिये बधाई ।

    omdikshit के द्वारा
    June 13, 2013

    आदरणीय अनिल जी, नमस्कार. आप ने बिल्कुल सही कहा.धन्यबाद.

priti के द्वारा
June 6, 2013

दीक्षित जी ,वो कहते हैं न कि,’चोर-चोर मौसेरे भाई’ ऐसे अवसरों पर ही इनका सगा पन दिखाई देता है, अच्छी और सार्थक पोस्ट के लिए आपको हार्दिक बधाई !

    omdikshit के द्वारा
    June 6, 2013

    आदरणीया प्रीति जी, नमस्कार एवं धन्यबाद.

alkargupta1 के द्वारा
June 6, 2013

adarniy deekshit ji, ye sabhi aese siyar hain jo svarth ke vashibhoot ek hi rang maen range nazar ate hain badhiya aalekh

    omdikshit के द्वारा
    June 6, 2013

    आदरणीया अलका जी, नमस्कार. आप की प्रतिक्रिया वाली लाइन मुझसे छूट गयी थी.धन्यबाद.

nishamittal के द्वारा
June 6, 2013

यही तो आश्चर्य है स्वार्थ सामने होते ही सबका भ्रातर प्रेम उमड़ पड़ता है और हम एक हैं का गीत

    omdikshit के द्वारा
    June 6, 2013

    आदरणीया निशा जी, नमस्कार. धन्यबाद.

jlsingh के द्वारा
June 6, 2013

आदरणीय दिक्षित जी, सादर अभिवादन! मैंने आपसे आग्रह किया था और आपने बहुत ही उत्तम समयानुकूल आलेख लिखा! वो कहते हैं न – “वो क़त्ल भी करते हैं, तो चर्चा नहीं होती हम आह भी भरते हैं, तो हो जाते हैं बदनाम!” और क्या कहें आपने सब कह दिया है और ऐसे ही मौकों पर ये एक हो जाते हैं और नियम बदल देते हैं! क्योंकि नियंता तो यही हैं! खैर देखा जाय – आगे आगे होता है क्या?

    omdikshit के द्वारा
    June 6, 2013

    आदरणीय सिंह साहब, नमस्कार. प्रोत्साहन के लिए धन्यबाद.


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